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IAS RAMESH GHOLAP : जानिए कैसे पंक्चर वाले का पोलियोग्रसित (विकलांग) बेटा, घर-घर माँ के साथ चूड़ियाँ बेच बना गाँव का पहला आईएएस

“आर्थिक तंगी जब अपने चरम पर होती है, तब इंसान के पास दो ही रास्ते होते है-अपने हालातो से समझौता कर लेना या फिर उनसे डटकर मुकाबला करते हुए अपनी गरीबी के अभिशाप से मुक्त होना.”

IAS RAMESH GHOLAP SUCCESS STORY : कुछ ऐसा ही हुआ आज की स्टोरी के पात्र के साथ, जिनका नाम है – आईएएस रमेश घोलप (IAS RAMESH GHOLAP). आर्थिक हालत इतने बदतर थे कि एक आदमी के लिए आसान नहीं होता उनसे बाहर निकलना लेकिन रमेश घोलप अपने बाएं पैर से पोलियो ग्रसित (विकलांग(दिव्यांग)) होने के बावजूद अपने हौंसले एवं शिक्षा के दम पर वो मुकाम हासिल किया जिसके बारे में कई लोग सोच भी नहीं सकते.


RAMESH GHOLAP के बचपन कि आर्थिक तंगी – 

रमेश घोलप का जन्म 30 अप्रैल 1988 को महागांव, बर्सी तालुका, जिला-सोलापुर, महाराष्ट्र में एक निर्धन परिवार में हुआ था. उनके पिता गोरख घोलप अशिक्षित थे एवं गाँव में ही साइकिल रिपेयरिंग कि दूकान चलाते थे.

उनकी आय ही परिवार के चार सदस्यों कि आजीविका का साधन मात्र थी, किन्तु उनके पिता को शराब की बुरी लत थी, जिससे उनकी आधी कमाई खर्च हो जाती थी. साथ ही उनके स्वास्थ्य एवं परिवार के राशन-पानी एवं बच्चो की शिक्षा पर भी काफी बुरा असर पड़ रहा था. 

रमेश की प्रारंभिक स्कूली शिक्षा गाँव की ही सरकारी स्कूल में मराठी भाषा में हुई. आगे की शिक्षा के लिए गाँव में स्कूल न होने की वजह से उन्होंने अपने चाचा-चची के पास बर्सी जाने का रुख किया एवं वहा की जिला परिषद् की स्कूल में 12वीं तक की शिक्षा पूर्ण की.

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जब माँ एवं भाई के साथ गली-गली बेचीं चूड़ियाँ

जब रमेश 12वीं की कक्षा में थे, तब उन्हें एक बेहद दुखद समाचार प्राप्त हुआ, अपने पिता के निधन का. उनके पास उस समय बर्सी से अपने गाँव जाने तक का बस का किराया भी नहीं था. जो की मात्र 7 रूपये हुआ करता था. एवं रमेश के विकलांग (दिव्यांग) होने के नाते 2 रूपये ही था. एक पड़ौसी की मदद से वे अपने गाँव पहुंचे एवं पिता की अंतिम यात्रा में शामिल हो पाए. 


उनके पिता की मृत्यु अधिक शराब के सेवन के कारण हुई थी, वे काफी लम्बे समय तक बीमार भी रहे एवं गाँव के ही सरकारी अस्पताल में पैसो की कमी के कारण इलाज भी नहीं ले पाए.

पिता के निधन के पश्चात परिवार की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उनके व माँ के कंधो पर आ गई. माँ ने कुछ रकम उधार लेकर चूड़ी बेचना शुरू किया, जिसमे रमेश एवं उनका छोटा भाई उनकी मदद किया करते थे. चूड़ियाँ बेचते समय वे एवं उनका भाई गली-गली जाकर जोर से आवाज लगाते और उनकी माँ चूड़ी लेने आई महिलाओं को चूड़ी पहनाकर दिखाती थी. 


इसी दौरान उनकी 12वीं कक्षा के प्रैक्टिकल के एग्जाम थे, जिसमे उन्होंने माँ के कहने पर परीक्षा दी, किन्तु रसायन विज्ञान की परीक्षा देकर पुन: अपनी माँ की मदद हेतु गाँव आ गए. 

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RAMESH GHOLAP के लिए शिक्षक बना मददगार – 


रसायन विज्ञान की प्रैक्टिकल परीक्षा में उन्हें 40 में से 35 अंक मिले, इसकी जानकारी उनके स्कूल के शिक्षक ने दी एवं आगे की सम्पूर्ण परीक्षा देने के लिए मदद का आग्रह भी किया. इससे प्रफुल्लित होकर रमेश ने अपनी 12वीं कक्षा वर्ष 2005 में 88.5% अंको से उत्तीर्ण की.

12वीं कक्षा के पश्चात उन्होंने D.ED (Diploma In Education) किया, जिससे उन्हें अध्यापक की नौकरी मिल गई एवं माँ को चूड़ी बेचने के काम से आजादी. इसके साथ ही उन्होंने मुक्त विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक (कला संकाय) से भी पूर्ण की. 

वे अपनी माँ एवं छोटे भाई के साथ बर्सी में अपने चाचा के दो कमरों के मकान में एक कमरे में रहने लगे. चाचा को यह मकान सरकार की और से BPL (गरीबी रेखा से नीचे) लोगो की सहायता हेतु योजना ‘इंदिरा आवास योजना’ के तहत मिला था.


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RAMESH GHOLAP की UPSC की प्रेरणा

1. चाचा को जिस योजना के तहत सरकार आवास योजना से मकान मिला था ‘उसी के लिए रमेश ने भी अपना आवेदन किया, किन्तु उनका BPL Card मान्य न होने के कारण उस योजना का उन्हें लाभ नहीं दिया गया’ यह पहला कारण था जिसकी वजह से वे UPSC के लिए प्रेरित हुए.


2. जब वे पढ़ाई करते थे, तब उनके गाँव में बिजली नहीं हुआ करती थी, अत: वे चिमनी एवं लालटेन की रौशनी में पढ़ाई किया करते थे. उसके लिए जरुरी ईंधन-केरोसिन जो कि राशन कि दूकान पर मिलता था, लेकिन राशन विक्रेता अपने लालच के लिए उसे गाँव में ज्यादा कीमत पर बेचा करता था, जिसके की उनके पास पैसे नहीं होते थे. इसलिए उन्हें केरोसिन को बड़ी देखभाल से खर्च करना होता था एवं इस वजह से वे कई कार्य अँधेरे में ही पूर्ण किया करते थे.

इस तरह की कालाबाजारी एवं भ्रष्टाचार को मिटाने की चाहत से भी उनको UPSC की प्रेरणा मिली.

3. जब उनकी माँ-विमल घोलप, विधवा होने के नाते सरकारी योजना ‘विधवा पेंशन योजना’ का आवेदन करने गई तब वहाँ के कर्मचारी द्वारा उन्हें पेंशन शुरू करवाने के बदले में रिश्वत की मांग की गई. साथ ही उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया इससे आहात होकर भ्रष्टाचार को ख़त्म करने हेतु भी उन्हें UPSC पास करने की प्रेरणा मिली.


4. अपनी 12वीं कक्षा के पश्चात अध्यापक की नौकरी करते हुए, वे गाँव के जरूरतमंद लोगो की सहायता भी किया करते थे, इसी के चलते वे कई बार तहसील कार्यालय में तहसीलदार से समस्या के निवारण के लिए मिलते थे.

तहसीलदार के पद एवं कार्य की जिम्मेदारी एवं लोगो में उस पद की प्रतिष्ठा और सम्मान देखकर भी उनके मन में UPSC पास करने की प्रेरणा मिली.


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जब RAMESH GHOLAP ने किया राजनीतिक पार्टी का गठन –

अपनी अध्यापक की नौकरी से 6 माह का अवकाश ले, वे वर्ष 2010 में UPSC की तैयारी करने के लिए गए, लेकिन उन्हें उस परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं हुई.


वापिस गाँव लौटकर उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक राजनीतिक पार्टी का गठन किया एवं गाँव में होने वाले सरपंच चुनाव में अपनी माता को उम्मीदवार बनाया. उन्होंने सामाजिक उत्थान एवं शिक्षा के महत्त्व को बढ़ावा देने आदि मुद्दों पर चुनाव लड़ा, किन्तु उनकी माता कुछ ही वोटो के अंतर से वह चुनाव हार गई. इस बात पर गाँव में उनका काफी मजाक उड़ाया गया.

जब कसम ली अधिकारी बनने की –

गाँव में उन्हें रमेश घोलप की बजाय ‘रामू’ नाम से पुकारा जाता था. चुनाव में हार के पश्चात उनका काफी मजाक बनाया गया. इससे उद्वेलित होकर उन्होंने कसम खाई कि ‘अब वे गांव तभी लौटेंगे, जब वे बड़े अधिकारी बन जायेगे.’


उनकी माँ ने उनके इस निर्णय का समर्थन करते हुए, ‘स्वयं सहायता समूह’ से ऋण लेकर उन्हें पढ़ने के लिए पुणे भेजा, जिससे वे अपनी UPSC कि पढ़ाई पूरी कर सके.

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पुणे पहुंचकर उन्होंने कोचिंग संस्थान के अध्यापक ‘श्री अतुल लांडे’ सर से मिलकर उनसे कुछ सवाल पूछे जैसे – ‘क्या वे UPSC व MPSC की परीक्षा दे सकते है?’, ‘क्या परीक्षा मराठी माध्यम में दी जा सकती है?’ आदि जब सर ने उनसे कहा कि कोई भी उन्हें UPSC की परीक्षा देने से नहीं रोक सकता.


फिर क्या था, वे जुट गए जी-जान से UPSC की तैयारी में. UPSC की तैयारी के दौरान ही उन्होंने State Institute of Administrative Carrers (SIAC) की परीक्षा उत्तीर्ण की, जहां उन्हें स्कॉलरशिप एवं रहने के लिए हॉस्टल की सुविधा मिली, साथ ही वे पोस्टर पेंटिंग का कार्य कर अपने अन्य खर्चो को व्यवस्थित करते थे.

वर्ष 2012 में उन्होंने UPSC की परीक्षा दी, जिसमे उन्होंने पुरे भारत वर्ष में 287वीं रैंक हासिल की और अपनी कसम को सच साबित किया. वे सच में एक अधिकारी के रूप में 12 मई 2012 को पुन: गाँव लौटे, जहां उनका सम्पूर्ण गाँव द्वारा गर्मजोशी के साथ स्वागत कर अभिनंदन किया गया.


UPSC की परीक्षा के साथ ही उन्होंने MPSC (महाराष्ट्र लोग सेवा आयोग) जिसमे भी उन्होंने प्रचंड सफलता प्राप्त करते हुए प्रथम रैंक प्राप्त की.

वर्तमान में वे झारखंड कैडर चुनने के कारण झारखंड सरकार में Joint Secretary के पद पर विद्युत विभाग (Electricity Department) में कार्यरत है, अपनी नियुक्ति के पहले दिन वे अपनी माँ के साथ कार्यालय गए थे.

उसके बाद उन्होंने पारिवारिक रिति-रिवाज से पत्नी-रुपाली के साथ विवाह किया, उनके एक पुत्र भी है.


साथ ही वर्तमान में रमेश घोलप गरीब एवं असहाय बच्चो की शिक्षा एवं उत्थान के लिए कार्य करते है एवं UPSC की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए मोटिवेशनल एवं ज्ञानवर्धक स्पीच भी देते है.

उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है, मराठी भाषा में जिसका नाम – ‘इथे थांबणे नाही’ (Ithe Thambe Nahi) भी लिखी है. इस पुस्तक में उन्होंने अपनी पूरी जीवन-यात्रा का वर्णन किया है.

अंत में रमेश घोलप की कहानी उन सभी युवाओ के लिए एक अँधेरे में प्रकाश-दीप की तरह है कि कैसे एक इंसान ही अपना ‘भाग्य विधाता’ होता है. अगर वो कुछ भी ठान ले तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं.

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