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JAYESH DESAI : 300 रुपये से शुरुआत कर 2500 करोड़ का साम्राज्य स्थापित करने वाले साधारण व्यक्ति की कहानी

“अगर व्यक्ति के अंदर लगन और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता”

SUCCESS STORY OF JAYESH DESAI : ऊपर दी गई कहावत आज की हमारी सक्सेस स्टोरी के नायक के ऊपर बिल्कुल फ़िट बेठती है. हमारे देश कि युवा शक्ति का लोहा तो पूरी दुनिया में माना जाता है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती है युवा शक्ति को सकारात्मकता की ओर मोड़ना अगर हम इस शक्ति को सही दिशा में मोड़ने में सफल हो पाते है तो हमारे देश को नई ऊँचाइयाँ चुने से कोई नही रोक सकता.

आज की सक्सेस स्टोरी में हम एक ऐसी ही शख्सियत की कहानी लेकर आये हैं जिनकी सफलता आने वाले युवा वर्गों को यह विश्वास दिलाती है कि इस दुनिया में हर वह व्यक्ति सफल हो सकता है जो अपने लक्ष्य की राह में आने वाली तमाम चुनौतियों का मुकाबला करने की हिम्मत खुद में पैदा कर सके.

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JAYESH DESAI

JAYESH DESAI का बचपन ओर संघर्ष

आज हम बात करने जा रहे हैं 2,500 करोड़ के राजहंस समूह की स्थापना करने वाले जयेश देसाई (JAYESH DESAI) की सफलता के बारे में. जयेश देसाई भावनगर जिले के गारिहार नामक एक ऐसे छोटे से गांव से ताल्लुक रखते हैं जो पिछले कई दशकों से मुलभुत सुविधाओं तक से वंचित रहा है.

जयेश देसाई का जन्म एक वैष्णव बानिया के घर में हुआ. ओर इनका अधिकांश बचपन अपने गाँव में ही बिता. जयेश देसाई के पिता एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे. जनेश का जन्म चार बेटियों के बाद हुआ इस प्रकार यह अपने घर में सबसे छोटे सदस्य थे. इतने बड़े परिवार के भरण-पोषण के लिए इनके पिता द्वारा चलाई जाने वाली किराने की दुकान बहुत छोटी थी.

इस दुकान से उनके परिवार की बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करने के लिए भी पर्याप्त पैसे इकट्ठा नही हो पाते थे. इसी कारण से जयेश को अपने बचपन से ही हर मोर्चे पर कमी का सामना करना पड़ा. जयेश को उनके बचपन से ही कारों का बेहद शौक था लेकिन उन्हें पता था कि उनकी आर्थिक हालातों के कारण उन्हें सिर्फ गाड़ियों को देखकर ही संतोष करना पड़ेगा.

उन दिनों ही उनके गाँव से कई परिवार रोज़गार की तलाश में भटकते हुए सूरत चले गए और वहाँ पर जाकर उन्होंने ढ़ेर सारा पैसा कमाया. जब वे परिवार अपनी-अपनी कारों में छुट्टी के दौरान अपने गांव जाते तो जयेश देसाई उन्हें देख बहुत उत्साहित होते और उस समय उनके भीतर भी एक बड़ा आदमी बनने की प्रेरणा उत्पन्न होती थी.

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RAJHANS

JAYESH DESAI ने किया मुंबई का रुख़

जयेश देसाई इस बारे में बताते हैं कि धीरे-धीरे हमारे समुदाय के अधिकांश लोगों का पलायन उस समय मुंबई की ओर होना शुरू हो गया. जयेश देसाई ने भी उसी समय अपनी बड़ी बहन भावना की मदद से मुंबई का रुख किया और नगदेव के नारायण ध्रुव स्ट्रीट पर 300 रुपये के मासिक वेतन पर एक बॉल-बियरिंग की दुकान में काम करना शुरू कर दिया.

इस प्रकार से जयेश देसाई ने 30 रुपये प्रति माह की दर पर भोजन और 6-7 रूममेट्स के साथ कांदिवली में एक छोटे से कमरे में फर्श पर सोते हुए अपनी जिंदगी की शुरुआत की. जयेश देसाई ने यहाँ पर किसी तरह छह महीने काम करते हुए बिताए किंतु इसके बाद उन्हें फिर से गांव की याद आ गई और इन्होंने अपने पिता को एक पत्र लिखते हुए वापस घर आने की अपनी इच्छा बताई.

जयेश देसाई साल 1989 में वापस गांव पहुँच गए ओर वहाँ जाकर अपने पिता की उसी छोटी सी दुकान को ही आगे बढ़ाने की दिशा में काम करना शुरू किया. इस दौरान करीबन तीन साल तक तेल और साबुन बेचते-बेचते जयेश को इस बात का तो एहसास हो गया था कि इस प्रकार से किराये की दूकान चलाकर वे कभी भी अपनी महंगी गाड़ियों की सवारी करने का अपना सपना पूरा नही कर पाएँगे.

इसी दरम्यान एक दिन इनके बचपन के एक मित्र छुट्टी के दौरान गाँव आए. उस समय उनके इस दोस्त ने सूरत में हीरा व्यापार की दलाली करते हुए बहुत पैसे बनाये थे. उन्होंने जयेश से इस बारे में बात की ओर एक बार फिर से सूरत आने के लिए राजी कर लिया.

जयेश बार फिर से बिना किसी पूर्व योजना के घर से 500 रुपये साथ लेकर सूरत की ओर रवाना हो गए. सूरत पहुँचने तक उनकी जेब में 500 में से सिर्फ़ 410 रुपये ही शेष बचे. सूरत पहुँचकर अपने दोस्त के बताये हीरा व्यापारी के यहाँ इन्होंने कुछ महीनों तक काम किया लेकिन इसी दौरान इनके दिमाग में एक आइडिया आया.

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HOTEL RAJHANS REGENCY

किराए की दुकान से की राजहंस की शुरुआत

इन्होंने इसके तहत अपने एक मित्र की सहायता से वचहार रोड पर एक दुकान किराए पर लेते हुए तेल बेचने का धंधा शुरू किया. इस प्रकार से एक बार फिर से पावाडी के पास धस्सा में एक तेल मिल से सीमित समय के लिए उधार लेते हुए जयेश देसाई की तेल की दुकान शुरू हुई थी.

जब जयेश के पिता को इस बात का पता चला तो उन्होंने खुद तेल भेजना शुरू किया और जयेश उसे बेच कर वापस पैसे अपने पिता को भेज देते थे. उनके द्वारा शुरू किया गया यह नया धंधा अच्छा चला और पहले ही महीने उन्हें 10,000 रुपये का मुनाफा हुआ.

इसी आइडिया के साथ आगे बढ़ते हुए जयेश देसाई ने पहले ही वर्ष 5 लाख रुपए का मुनाफा कमाया. शुरूआती सफलता से इनके बुलंद हौंसलो को एक नई ताकत मिली और उसके बाद इन्होंने अपने अनुभव का इस्तेमाल करते हुए कामरेज में एक छोटे से शेड में दो टैंकों के साथ अपने स्वयं के ब्रांड राजहंस तेल की शुरुआत की.

जयेश देसाई बताते हैं कि शुरुआत में हम फ़िल्टर्ड मूंगफली और कपास के तेल का इस्तेमाल करते थे. साल 1995 तक मुंबई में हमारे आधार पहले के मुक़ाबले बहुत अधिक मजबूत हो चुके थे और उसके बाद हमने गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र को कवर किया ओर इस प्रकार से शीर्ष पांच कंपनियों में शामिल हो गये.

तेल के क्षेत्र में सफलता हासिल करने के बाद, जयेश देसाई ने अन्य क्षेत्रों में पैठ ज़माने के उद्देश्य से साल 1999 में एक कपड़ा मिल का अधिग्रहण कर लिया. और इसके बाद उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नही देखा ओर साल-दर-साल आगे बढ़ते हुए देश के एक नामचीन उद्योगपति के रूप में शूमार होने लगे.

जयेश देसाई शुद्ध शाकाहारी परिवार से संबंध रखते है ओर इन्होंने शिरडी, वैष्णो देवी और तिरुपति में तीन शुद्ध पांच सितारा शाकाहारी रेस्तरां भी खोले. बाद में इन्होंने 200 करोड़ रुपयों का निवेश करते हुए कैडबरी और नेस्ले जैसी अंतराष्ट्रीय कंपनी को टक्कर देने के लिए चॉकलेट इंडस्ट्री में भी कदम रखा.

वर्तमान समय में जयेश के राजहंस समूह का सालाना टर्नओवर 2500 करोड़ के से ज़्यादा का है. इस प्रकार से एक छोटा सा बच्चा जो कभी दूसरों की गाड़ी देखकर उससे प्रेरणा लेते हुए खुद के भीतर एक दिन बड़ा आदमी बनने का सपना देखता था, आज अपनी सफलता से कई लोगों को प्रेरणा दे रहा है.

ओर एक बात ओर आप इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को शेयर करे ताकि लोग इससे प्रेरणा ले सके.

तो दोस्तों फिर मिलते है एक और ऐसे ही किसी प्रेणादायक शख्शियत की कहानी के साथ…

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