IAS SHWETA AGARWAL : जब तक आईएएस ऑफिसर का पद नहीं मिला तब तक सिलेक्ट होने के बावजूद दिया यूपीएससी का एक्जाम

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IAS SHWETA AGARWAL

“मेहनत की चाबी से ही सफलता का ताला खुलता है ।”

SUCCESS STORY OF IAS SHWETA AGARWAL : यूपीएससी की परीक्षा दे रहे किसी भी स्टूडेंट का सपना होता है की वह किसी भी तरह से एक बार इस परीक्षा को पास कर ले किन्तु आज की कहानी की मुख्य पात्र आईएएस श्वेता अग्रवाल (IAS SHWETA AGARWAL) ने तीन बार यूपीएससी (UPSC) की परीक्षा दी ओर तीनों बार उसमे सिलेक्ट भी हुई किन्तु जब तक उन्हे उनकी पसंद का पद आईएएस नहीं मिला तब तक उन्होंने हार नहीं मानी ओर अपने प्रयास को जारी रखा ओर वर्ष 2016 मे आखिर उन्हे आईएएस पद भी मिला.

IAS SHWETA AGARWAL का जन्म ओर बचपन

श्वेता का जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली मे हुआ. पुराने खयालात वाले परिवार मे इनके जन्म से माहौल खुशी का नहीं था. 28 लोगों वाले इस पुराने ख्याल मारवाड़ी परिवार में शुरू से ही लड़कियों के जन्म पर किसी प्रकार का उत्साह नहीं होता था, क्योंकि वे उनके वंश को आगे नहीं बढ़ा सकती थी.

लेकिन इसके विपरीत श्वेता के माता-पिता की सोच अलग थी. उन्होंने श्वेता के जन्म को न केवल ईश्वर की कृपा माना बल्कि उन्होंने मिलकर यह भी तय किया कि वे अपने परिवार की परंपराओं के विपरीत अपनी बेटी को खूब पढ़ाएंगे. किन्तु इस सबके बावजूद भी ऐसे परिवार में जन्मी श्वेता को आगे आने वाले समय में भी कदम-कदम पर परिवार की सोच से उपजी बेड़ियों को तोड़ने में खासी मशक्कत करनी पड़ी.

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IAS SHWETA AGARWAL का बचपन

श्वेता अग्रवाल के जन्म से ही उनके माता-पिता की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी परंतु इसके बावजूद वे चाहते थे कि श्वेता एक अच्छे इंगिल्श स्कूल में पढ़ाई करे. इसी सोच के साथ उन्होंने श्वेता का एडमीशन एक प्राइवेट स्कूल मे तो करा दिया परंतु हर महीने की फीस के 165 रुपये इकट्ठा करने में दोनों परेशान हो जाते थे.

श्वेता के स्कूल में एक दिन एक कार्यक्रम हुआ, श्वेता ने उस कार्यक्रम के लिए अपने पैरेंट्स से पैसे मांगे. इस पर श्वेता को उनकी माँ ने घर की स्थिति के बारे मे बताकर कहा कि वे किसी तरह से उसकी स्कूल की फीस ही अरेंज कर पाते हैं, ऐसे मे इस तरह के अतिरिक्त खर्चें वे नहीं उठा सकते.

इस घटना से सात साल की छोटी उम्र में ही श्वेता ने पैसे और पढ़ाई दोनों की कीमत सीख ली थी. उस दिन की घटना के बाद से श्वेता ने रिश्तेदार वगैरह के दिए हुए शगुन के 5 या 10 रुपये भी अपनी मां को देना शुरू कर डिया जिससे की उसकी पढ़ाई के लिए स्कूल की फीस के पैसे जमा किया जा सकें.

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ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए संघर्ष

श्वेता बचपन से ही पढ़ाई मे होशियार थी ओर क्लास 12 में उन्होंने अपने स्कूल में टॉप किया था. 12 वीं कक्षा के बाद मे जब श्वेता ने अपने परिवार मे ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने की बात की तो उनका परिवार जो कि पहले ही श्वेता की पढ़ाई में किसी प्रकार की रुचि नहीं दिखाता था, वह अब श्वेता के कॉलेज जाने ओर आगे की पढ़ाई की बात से और तुनक गया. क्योंकि श्वेता के परिवार में 18 साल तक की उम्र तक आते-आते लड़कियों की शादी कर दी जाती थी.

श्वेता के चाचा ने तो उनसे यह तक कह दिया कि इतना पढ़-लिखकर करना क्या है, जिंदगी मे आगे चलकर तो वैसे भी उसे चूल्हा-चौका ही करना है. किन्तु तमाम विरोधों के बावजूद अपने इरादे की पक्की श्वेता ने उस दिन अपने मन मे थान लिया की वह अपने परिवार को कुछ बड़ा करके दिखाएंगी.

उन्होंने सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज से इकोनॉमिक्स में अपना ग्रेजुएशन किया और कॉलेज की टॉपर बनीं. इसके बाद श्वेता ने एमबीकी पढ़ाई की ओर एमबीए पास करने के बाद एक एमएनसी में अच्छे पद पर उनकी नौकरी लग गई. इस प्रकार से श्वेता अपने परिवार के 15 बच्चों में से पहली ग्रेजुएट बनी.

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UPSC की तैयारी ओर प्रेरणा

श्वेता ने एक इंटरव्यू मे बताया कि उनके घर के पास मे पोलिस स्टेशन है, बचपन से ही जब पुलिस स्टेशन में ऑफिसर्स को देखती थी तो उनके द्वारा पहनी जाने वाली खाकी वर्दी से बहुत ही ज्यादा प्रभावित होती थी. उन्हें अपने बचपन से ही खाकी का बड़ा शौक था और वे हमेशा ही यह सोचती थी कि एक दिन वे भी ऐसी ही वर्दी पहनेंगी.

नौकरी के दौरान श्वेत का मन अपने काम मे नहीं लग रहा था ओर उनके मन मे बचपन का वही सपना पंख फैलाने लगा और श्वेता ने काफी सोच-विचार करने के बाद मे यूपीएससी की तैयारी करने का फैसला लिया. यह श्वेता के लिए एक बहुत बड़ा फैसला था क्योंकि वे एक बहुत ही बड़े पद के साथ उससे भी बड़े पैकेज पर कार्यरत थी.

यूपीएससी की तैयारी के फैसले के साथ मे श्वेता अपनी नौकरी छोड़कर आ तो गई किन्तु एक ऐसी परीक्षा का चुनाव करना जिसमें कि सफलता बहुत ही मुश्किल है, हर किसी के लिए इतना आसान नहीं होता. नौकरी छोड़ने के दौरान श्वेता के बॉस ने तो उनसे यह भी कहा कि हर साल 5 लाख स्टूडेंट्स यूपीएससी की परीक्षा देते हैं और उसमे से सिर्फ 90 ही आईएएस बनते हैं, ऐसे मे वह बेवकूफी भरा फैसला कर रही हो. तब श्वेता ने कहा कि वे इन 90 में आकर दिखाएंगी. किन्तु श्वेता ने उनकी बात नहीं मानी ओर नौकरी छोड़कर भद्रेश्वर अपने घर वापस आ गई.

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परिवार द्वारा शादी का दबाव

श्वेता द्वारा अचानक से नौकरी छोड़ घर आने का फैसला किसी को समझ नहीं आ रहा था. किन्तु श्वेता ने सब कुछ भुलाकर यूपीएससी की तैयारी शुरू की किन्तु ऐसा करने के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब श्वेता मेंटली अनस्टेबल हो गई और बिल्कुल भी पढ़ाई नहीं कर पा रही थी.

ऐसी स्थिति मे उनके ऊपर परिवार से शादी का दबाव भी पड़ने लग गया था क्योंकि उनके परिवार मे वह अकेली बड़ी उम्र की लड़की थी जो कुंवारी थी अन्यथा तो लड़कियों की शादी बहुत छोटी उम्र में हो जाती थी. श्वेता के पैरेंट्स ने जब उनसे इस बारे मे बात की तो उन्होंने उनसे कुछ टाइम मांगते हुए कहा कि मुझे पता है कि यह परीक्षा कठिन है परंतु मैं आईएएस बनने का अपना सपना जरूर पूरा करूंगी.

श्वेता इस बारे मे कहती है कि मुझे यह पता था कि शादी तो मैं 32 की उम्र में भी कर सकती हूं पर समय निकलने के बाद यूपीएससी की परीक्षा नहीं दे सकती. श्वेता ने यूपीएससी की तैयारी के लिए अपने घर से दो घंटे की दूरी पर एक कमरा किराये पर लिया और रहने लगीं. इस दौरान वे सारा काम भी करती और पढ़ाई भी करती थी. इस तरह से कमरे मे बंद होकर पढ़ाई करने से वहा के लोग बाते करने लगे कि घर से दो घंटे की दूरी पर रहकर यह लड़की न तो नौकरी कर रही है, न ही कहीं आती-जाती है बल्कि सारे दिन कमरे में बंद रहकर पता नहीं आखिर करती क्या है. श्वेता ने तैयारी के दौरान दो महीने कोचिंग ली किन्तु वहां से भी असंतुष्ट होकर आखिर मे सेल्फ स्टडी करने की योजना बनाई और दिन-रात पढ़ाई करने मे ही लगी रही.

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तीन बार हुआ चयन

श्वेता ने एक इंटरव्यू मे बताया कि यूपीएससी एक ऐसी परीक्षा है जिसे अगर किसी स्टूडेंट ने पास भी कर लिया उसके पश्चात भी अगले प्रयास मे दोबारा उसका सिलेक्शन प्री में भी होगा कि नहीं इस बात की कोई गारंटी नहीं होती.

इस परीक्षा के लिए हर बार ज़ीरो से ही अपनी शुरुआत करनी पड़ती है. ऐसे मे उनके साथ भी यह रिस्क इंवॉल्व था परंतु उन्होंने फालतू बातों पर ध्यान न देते हुए सिर्फ अपने दिल की सुनी और दोबारा से परीक्षा दी. श्वेता अग्रवाल की पहली बार में 497 रैंक आयी थी और ज्यादा रैंक आने की वजह से उन्हें आईआरएस सर्विस मिली थी.

अगले साल 2015 में श्वेता फिर से यूपीएससी मे सेलेक्ट हुई और इस बार उनकी 141 रैंक आई ओर वे इस बार भी  दस नंबर से आईएएस का पद प्राप्त करने से चूक गई. इस बार उन्हे आईपीस का पद मिला किन्तु उनकी आंखों में तो अभी भी आईएएस बनने का ही सपना घूम रहा था. जहा एक ओर अन्य स्टूडेंट एक बार सिलेक्ट होने को ही अपनी खुशकिस्मत समझते है वही हमे श्वेता की हिम्मत की भी मिसाल देनी होगी जो वे बार-बार आईएएस पद के लिए फिर से प्रयास करने का यह रिस्क ले रही थी.

श्वेता ने आईएएस बनने के लिए 4 से 5 सालों तक दिन में 9 घंटे की पढ़ाई की, ओर आखिरकार किस्मत ने भी श्वेता के आगे घुटने टेके और साल 2016 में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 19 प्राप्त करते हुए यह परीक्षा पास की. इसी के साथ श्वेता अग्रवाल लगभग एक डिकेड के बाद वेस्ट बंगाल से निकलने वाली पहली टॉपर बनीं, जिसने टॉप 20 में जगह बनायी हो.

ओर एक बात ओर आप इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को शेयर करे ताकि लोग इससे प्रेरणा ले सके. 

तो दोस्तों फिर मिलते है एक और ऐसे ही किसी प्रेणादायक शख्शियत की कहानी के साथ…

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