SUDIP DATTA : कैसे बने एक मजदुर से पैकेजिंग इंडस्ट्री के नारायणमूर्ति, जाने संघर्ष का पूरा सफर

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SUDIP DATTA

अगर इंसान को ज़िन्दगी में कुछ मुकाम हासिल करना है तो बहुत कुछ खोना पड़ता है

SUDIP DATTA SUCCESS STORY : वेस्ट बंगाल में दुर्गापुर के रहने वाले सुदीप दत्ता (SUDIP DATTA) ने जब  युवावस्था में कदम रखा तभी उनके सर से पिता और बड़े भाई का साया उठ गया था. पुरे परिवार की जिम्मेदारी उन्ही पर थी उन्हें ही सब कुछ निर्णय लेना था की वे अपनी ज़िन्दगी को किस मोड़ पर ले जाना चाहते है.

ऐसे में जहा अक्सर लोग आसान रास्ता चुनकर कुछ गलत तरीको से धन कमाना चाहते है वही सुदीप ने मेहनत और कठिन परिश्रम को चुन कर अपनी किस्मत खुद लिखी, आइये जाने उनकी पूरी कहानी –

SUDIP DATTA

SUDIP DATTA की पारिवारिक स्थिति

सुदीप के पिता आर्मी में थे और वर्ष 1971 की भारत-पाक युद्ध में उन्हें गोली लगने से शारीरिक रूप से अनफिट होने के वजह से घर बैठना पड़ा जहा उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया ऐसे में सुदीप के बड़े भाई ने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी संभाली लेकिन कुदरत की अनहोनी देखो की उन्हें एक गंभीर बिमारी लग गयी जिससे उनका निधन हो गया, वही अपने बेटे को खोने के सदमे में पिता भी चल बसे.

उस वक़्त सुदीप की आयु मात्र 16 वर्ष थी और वे युवावस्था में एंटर हुए थे जहा हर कोई अपने भविष्य के हसीन सपने संजोता है की आगे जाकर वह अपनी लाइफ को इस तरह सेट करेगा इतनी छोटी उम्र में ही अब परिवार का सारा बोझ उनके कंधो पर आ गया था.

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जब SUDIP DATTA ख़ाली हाथ निकले घर से

अपने दोस्तों और परिवार से सलाह कर वे मुंबई में मजदूरी के लिए खाली जेब रवाना हो गए बिना कुछ सोचे की वह कैसे रहेंगे, क्या काम करेंगे आदि साथ ही दिमाग में पिता और भाई को खोने का सदमा था वो अलग से लेकिन उनका फैसला सटीक साबित हुआ और उन्हें वहां पर 15/- की जॉब और रहने के लिए एक छोटा कमरा दिया गया जहा पर एक साथ 20 मजदुर रहते थे आलम यह था की सोते समय भी थोड़ी भी जगह नहीं बचती थी की वे लोग हिल-डुल सके वे रोजाना लगभग 40km दूर पैदल ही फ़ैक्टरी आया जाया करते थे, जिस से वे कुछ पैसा बचाकर अपने घर भेज सके.

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जब मालिक ने फ़ेक्ट्री बंद करने का ऐलान किया

अचानक एक दिन ऐसा आया जब फ़ैक्टरी के मालिक ने फैक्टरी बंद करने का बोला, यह सुनकर तो मानो सुदीप के पैरो तले जमीन खिसक गयी लेकिन अपने को सँभालते हुए मात्र 19 वर्ष के युवा ने जो बात कही उसको सुनकर सब लोग चकित रह गए उन्होंने बोला की आज से वे फ़ैक्टरी को संभालेंगे दो साल के मुनाफे में हिस्सेदारी के बाद फ़ैक्टरी मालिक भी मान गए लेकिन उनके सामने समस्या पैसो के साथ ही रोटी की थी और अब तो उन्होंने सात अन्य मजदूरों के पेट पालने की जिम्मेदारी भी ले ली थी.

SUDIP DATTA का वह निर्णय जिसने बदली ज़िंदगी

उन्होंने स्वयं के इक्कठे किये पैसो और दोस्त से 16,000 रुपये उधार लेकर काम शुरू किया और जहा काम करते थे आज उसके मालिक बन गए.

सुदीप यह अच्छी तरह से जानते थे की अभी एल्युमीनियम पैकेजिंग इंडस्ट्री का बुरा समय चल रहा है और यहाँ टिके रहने के लिए बड़े नामी ब्रांड से कॉम्पिटशन के साथ बने रहने के लिए बेहतर उत्पाद और नयापन ही बेहतर विकल्प साबित हो सकता है वे लगतार प्रयास करते रहे, जहा वे बड़े ग्राहकों के लिए वे घंटो मिलने का इंतज़ार करते और छोटे मोटे आर्डर से फ़ैक्टरी चला रहे थे, चुकी वे मेहनती और बोलने में अच्छे थे इस से प्रभावित होकर उनकी मेहनत रंग लायी और नेस्ले,सन-फार्मा आदि कंपनी के ऑर्डर्स मिलना शुरू हो गए.

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जब SUDIP DATTA को इंडस्ट्री से मिला चेलेंज

सफलता के रथ पर सवार सुदीप को आने वाले खतरे का अंदेशा भी नहीं था सालो से बंद पड़ी “इंडिया फॉयल” कंपनी को विश्व की शीर्ष कंपनियों में शुमार “वेदांत ग्रुप्स” के मालिक अनिल अग्रवाल ने खरीद कर फिर से स्टार्ट किया उनके आगे टिक पाना सुदीप के लिए आसान नहीं था.

लेकिन बड़ी सूझ-बुझ के साथ अपने कस्टमर्स के साथ रिश्तो को मजबूत बनाये रखा साथ ही अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी को भी बेहतर बनाते गए आखिरकार अनिल अग्रवाल जैसे दिग्गज को भी उनके आगे झुकना पड़ा और “इंडिया फॉयल” कंपनी को उन्ही को बेचकर हमेशा के लिए पैकेजिंग इंडस्ट्री से अलविदा कर दिया.

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जब बने एल्यूमिनियमपैकेजिंग इंडस्ट्री के बादशाह

यहाँ से हौसला पाकर सुदीप ने वर्ष 1998 से वर्ष 2000 के बीच 20 से ज्यादा प्रोडक्शन यूनिट्स खड़े कर दिए साथ ही कमजोर खस्ता हाल कंपनियों को भी खरीद लिया जिससे उनका एलीमुनियम पैकेजिंग इंडस्ट्री में एकछत्र साम्राज्य खड़ा हो गया.

आज की तारीख में सुदीप की कंपनी “एस डी एलीमुनियम” बीएसई (BSE) और  एनएसई (NSE) में लिस्टेड और इसका मार्किट कैप लगभग 1600 करोड़ से ज्यादा का हो गया है .

इतना सब कुछ हासिल करने के बाद भी सुदीप बिलकुल नहीं बदले अभी भी उनके वर्कर्स उन्हें ‘दादा’ कहकर बुलाते है, वे हमेशा से अपनी जड़ो से जुड़ाव रखे हुए इंसान के रूप में पहचाने जाते है साथ ही सामाजिक सरोकार के तहत उन्होंने गरीब और निर्धन के लिए “सुदीप दत्ता फाउंडेशन” की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य निम्न श्रेणी से आने वाले प्रतिभावान युवाओ को कौशल प्रदान करना और आगे बढ़ने के लिए नए अवसर देना है.

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