SRIKANTH BOLA – नेत्रहीनता के अभिशाप को वरदान में बदलकर बनाया 50 करोड़ से ज्यादा का कारोबार

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“सर्वश्रेष्ठ मनुष्य वही है जो केवल और केवल अपनी मजबूती और अच्छाइयों पर अपना ध्यान केंद्रित करे”

SRIKANTH BOLA SUCCESS STORY : मनुष्य की ज़िन्दगी में यदि कोई चैलेंज या संघर्ष ना हो तो जीवन बड़ा बोरिंग और शिथिल हो जाता है, व्यक्ति को हमेशा जीवन में आगे बढ़ने के लिए मुश्किल और विपरीत हालातो से सामना करना पड़ता है और यही जीवन का सार है.

लेकिन यदि किसी मनुष्य के जीवन की शुरुआत के साथ ही शरीर में कमी या अपंगता हो तो आने वाली छोटी सी भी कठिनाई मनुष्य को झकझोर के रख देती है, कुछ ऐसा ही हुआ आज की कहानी के रियल हीरो श्रीकांत बोला (SRIKANTH BOLA) के जीवन में.

जहा अधिकतर लोग इन परिस्थितियों से हार जाते है वही श्रीकांत अपने जीवन में इन सभी मुश्किल हालातो से दो-दो हाथ कर सभी को पीछे धकेलते हुए जीवन में आगे बढ़ते चले गए और वह कर दिखाया जो एक साधारण इंसान के लिए भी कर पाना बेहद मुश्किल होता है.

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SRIKANTH BOLA का जन्म ओर बचपन

श्रीकांत बोला का जन्म आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गांव में एक किसान परिवार में हुआ था, उनके माता-पिता दोनों ही खेती का काम कर जीवन यापन करते थे, जब उनके घर श्रीकांत का जन्म हुआ तब खुशियों की जगह घर में मातम छा गया.

श्रीकांत बोला अपने जन्म से ही नेत्रहीन थे, इसको उनके माता-पिता एक अभिशाप मानते थे इसके साथ ही श्रीकांत के परिवार और अन्य लोगो ने उन्हें अकेले मरने के लिए छोड़ने की बात तक कर डाली.

इतना ही नहीं वे परिवार के लिए भोझ जैसे बनने लगे, नार्मल बच्चो की तरह वे नहीं रह सकते थे. उनकी इस कमी को लोगो द्वारा उन्हें हर-बार हर जगह याद दिला कर प्रताड़ित किया गया. जब भी श्रीकांत अन्य बच्चो के साथ खेलने जाते तब भी उन्हें ताने सुनने पड़ते थे.

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SRIKANTH BOLA की EDUCATION

किन्तु श्रीकांत बोला अपनी दादी के बहुत लाडले थे इसी वजह से उनका सभी काम दादी ही किया करती थी, धीरे-धीरे जब वे कुछ बड़े हुए तो शिक्षा की बारी आयी किन्तु किसी भी स्कूल में उन्हें दाखिला नहीं मिला तब श्रीकांत के चाचा ने उन्हें हैदराबाद की ब्लाइंड स्कूल (अन्धो के लिए विद्यालय जहा पर ब्रेल लिपि में पढाई होती है) में भेजने का सुझाव दिया.

इतनी छोटी उम्र में घर से लगभग 400 km दूर अकेले वह भी शरीर में अपंगता होते हुए श्रीकांत को बाहर रहना पड़ा जहा पर उनका मन नहीं लगा और वे वहा से भाग निकले, चाचा ने उन्हें ढूंढ निकाला और श्रीकांत बोला से केवल एक बात कही जिसने श्रीकांत की आगे की पूरी ज़िन्दगी बदल डाली और सवाल था – “वह घर पर रह कर किस तरह की जिंदगी जीना चाहता है?”

चाचा द्वारा पूछे गए इस सवाल के बाद जीवन में श्रीकांत ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी दसवीं कक्षा में स्कूल में फर्स्ट पोजीशन बनाई साथ ही वे आगे साइंस लेना चाहते थे लेकिन अंधे बच्चो के लिए इसकी सुविधा नहीं थी अतः श्रीकांत को मजबूरी में आर्ट्स लेना पड़ा किन्तु उन्होंने इसके खिलाफ याचिका दायर कर जब तक कानून में बदलाव नहीं हुआ तब तक लड़ाई जारी रखी.

अपनी बारहवीं कक्षा के बाद श्रीकांत ने आई. आई. टी में इंजीनियरिंग की पढाई के लिए आवेदन किया किन्तु वहा पर भी वही कहानी दोहराई गई, इसके बाद श्रीकांत बोला ने विश्व की प्रतिष्ठित “मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी” में आगे की पढ़ाई के लिए आवेदन किया. वह पहले ऐसे नेत्रहीन छात्र थे जिन्हें एमआईटी में पढ़ने का मौका मिला था.

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समन्वय संगठन की नींव रखी

श्रीकांत बोला अपना अध्ययन पूरा कर भारत लौट आये और हैदराबाद में एक गैर सरकारी संगठन – “समन्वय” की नीव रखी जिसका उद्देश्य विकलांग छात्रों के जीवन की सभी जरूरतों को पूरा करना था.

कुछ समय बाद इससे आगे बढ़ते हुए वर्ष 2012 में श्रीकांत ने अपने एक नए बिज़नेस की नीव रखी, श्रीकांत का हमेशा से एक ही लक्ष्य रहा जो हालत उनकी है वैसे ही लोगो के सर्वागीण विकास के लिए कार्य करना और अपने जैसे बदतर हालातो से उन्हें सुरक्षित करना है.

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Bollant Industries की शुरुआत

श्रीकांत बोला के नए बिज़नेस “Bollant Industries pvt. ltd” में दिव्यांग लोगों के लिए रोजगार के अवसर प्रदान किये जाते है.

इस कंपनी में इको-फ्रेंडली उत्पाद बनाये जाते हैं जैसे-ऐरेका लीफ प्लेट्स, कप्स, ट्रेज और डिनर वेयर, बीटल प्लेट्स और डिस्पोजेबल प्लेट्स, चम्मच, कप्स आदि. बाद में इसमें इन्होंने गोंद और प्रिंटिंग उत्पाद को भी शामिल कर लिया. श्रीकांत ने अपने बिज़नेस मॉडल और क्रियान्वयन की सारी जिम्मेदारी रवि मंथ को सौप रखी है जो न केवल श्रीकांत की कंपनी में इन्वेस्टर है बल्कि वह उनके मेंटर भी थे.

आज उनकी कंपनी में 150 दिव्यांग लोग काम कर रहे हैं. उनकी सालाना बिक्री 75 लाख के पार हो चुकी है. रतन टाटा ने भी श्रीकांत को फण्ड प्रदान किया है. 2016 में श्रीकांत को बेस्ट इंटरप्रेन्योर के अवार्ड से सम्मानित भी गया है.

श्रीकांत बोला के जीवन का बड़ा ही सिंपल सा फंडा है की दिव्यांग लोगो के साथ भगवान् ने पहले से ही एक क्रूर मजाक कर रखा होता है फिर उन्हें दुनिया के किसी भी ताने और मजाक से फर्क नहीं पड़ता, साथ ही मुश्किल वक़्त में धैर्य रखना ही सबसे बड़ी पूंजी है जिसकी वजह से मुश्किल से मुश्किल हालात में भी आप उभर कर निकल आते है.

जब श्रीकांत बोला से सवाल पूछा गया की 24 साल की कम उम्र में श्रीकांत ने काफी कुछ हासिल कर लिया. अब आगे क्या? तब श्रीकांत बोला ने कहा – “मेरे जीवन की महत्वाकांक्षा भारत का राष्ट्रपति बनना है.”

ओर एक बात ओर आप इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को शेयर करे ताकि लोग इससे प्रेरणा ले सके. 

तो दोस्तों फिर मिलते है एक और ऐसे ही किसी प्रेणादायक शख्शियत की कहानी के साथ…

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