दिल्ली में कोचिंग लेने के पैसे नहीं थे। पिता सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान चलाकर घर का खर्च उठाते थे।
पढ़ाई के साथ-साथ देव कई बार अपने पिता की चाय की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे। इंटरनेट और यूट्यूब से अपने कॉन्सेप्ट क्लियर किए।
आज देव डुडेजा ने अपनी कड़ी मेहनत से साबित कर दिया कि अगर इरादे पक्के हों, तो चाय वाले का बेटा भी IAS बन सकता है!